टीबी समझकर किया जा रहा था इलाज, निकला कोरोना

दिल्ली क्या हो अगर मरीज का इलाज टीबी समझकर किया जा रहा हो और बाद में पता चले कि उसे कोरोना है? कुछ ऐसी ही स्थिति का सामना दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में काम करने वाले टीबी वर्कर्स को करना पड़ रहा है। इसी तरह का मामला बाबू जगजीवन राम अस्पताल में भी सामने आया था, जिसके बाद अस्पताल के 6 से ज्यादा स्टाफ को कोरोना पॉजिटिव पाया गया। टीबी वर्कर्स का कहना है कि टीबी और कोरोना के लक्षण लगभग एक जैसे हैं। खांसी, बुखार दोनों ही मरीज में पाए जाते हैं। इस स्थिति में अगर मरीज का इलाज टीबी समझ कर किया जाए और बाद में उसे कोरोना पाया जाता है, तो वर्कर्स पर खतरा है। तीन हजार वर्कर्स कॉन्ट्रैक्ट पर टीबी सोसायटी यूनियन के वाइस प्रेजिडेंट और बाबू जगजीवन राम अस्पताल के टीबी डिपार्टमेंट में काम करने वाले हीरालाल प्रधान का कहना है कि दिल्ली में तीन हजार टीबी वर्कर्स कॉन्ट्रैक्ट पर है। उन्हें न तो जांच के लिए पीपीई किट मिली और न ही मास्क-सैनिटाइजर। यही कारण था कि बाबू जगजीवन राम अस्पताल में एक के बाद एक स्टाफ कोरोना पॉजिटिव होता चला गया। जांच में डर रहे कर्मचारी प्रधान ने बताया कि अस्पताल में टीबी मरीज का इलाज किया जा रहा था लेकिन बाद में पता चला कि कोरोना है। स्थिति यह है कि टीबी मरीजों को हाथ लगाते हुए भी डर रहे हैं। ऐसे में अगर कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स को कुछ होता है तो उनके लिए केंद्र और दिल्ली सरकार ने जो से मरने के बाद राशि निर्धारित की गई है, वह भी नहीं मिलेगी। ऐसे में अब टीबी मरीज की जांच में भी डर लगने लगा है।


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